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नारनौल | ‘मुर्गों की नर्सरी’ के बाद अब ‘गौशाला बनाम किसान के बलद’ की जंग : अभय सिंह यादव के तंज से अहीरवाल की राजनीति गरमाई
मंडलाना गांव में शहीद ओमप्रकाश यादव की प्रतिमा अनावरण के दौरान पूर्व सिंचाई मंत्री अभय सिंह यादव का बयान अब पूरे अहीरवाल यानी दक्षिण हरियाणा की राजनीति में नई बहस को जन्म दे रहा है। हाल ही में चर्चा में रहे “मुर्गों की नर्सरी” वाले सियासी तंज के बाद अब “गौशाला का बलद बनाम किसान का बलद” राजनीति का नया प्रतीक बनकर उभर रहा है। मंच से बिना किसी का नाम लिए अभय सिंह यादव ने विरोधियों पर तीखा कटाक्ष करते हुए साफ संदेश दिया कि असली पहचान जमीनी काम से होती है, न कि केवल पद, नाम या दिखावे से।
अपने संबोधन में उन्होंने भावनात्मक उदाहरण देते हुए कहा कि पहले किसान दिनभर खेत में मेहनत करने के बाद शाम को अपने बलदों के सिर पर हाथ फेरता था, जो उनकी मेहनत की सराहना का प्रतीक होता था—मानो वह उन्हें “शाबाश, लगे रहो” कह रहा हो। यह परंपरा उस दौर को दर्शाती है, जहां काम करने वालों को सम्मान मिलता था और उनकी मेहनत की कद्र होती थी। इसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि हल खींचने की ताकत उसी बलद में होती है जो खेत में पसीना बहाता है, जबकि गौशाला का बलद गाड़ी भी नहीं खींच पाता। उन्होंने आगे जोड़ा कि गौशाला के बलद और किसान के बलद में फर्क सिर्फ मेहनत का होता है।
उनका यह बयान सीधे तौर पर किसी का नाम लिए बिना दिया गया, लेकिन राजनीतिक तौर पर इसे उन नेताओं पर करारा तंज माना जा रहा है जो जमीनी स्तर पर सक्रिय नहीं हैं, जबकि खुद को बड़ा और प्रभावशाली दिखाने की कोशिश करते हैं। अहीरवाल क्षेत्र में इस बयान के बाद “काम करने वाले बनाम दिखावा करने वाले” की बहस तेज हो गई है और गांव-गांव में यह उदाहरण चर्चा का विषय बना हुआ है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि “मुर्गों की नर्सरी” के बाद अब “गौशाला बनाम किसान का बलद” वाला यह तंज दक्षिण हरियाणा की राजनीति में एक नया नैरेटिव सेट कर रहा है। यह केवल बयान नहीं, बल्कि एक सियासी संदेश है, जो कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को यह सोचने पर मजबूर करता है कि असल में उनके बीच काम कौन कर रहा है और कौन केवल दिखावे की राजनीति कर रहा है।
इसी बीच, अब इस बयान को लोग उनके पिछले 10 साल के कार्यकाल से जोड़कर भी देख रहे हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि लंबे समय तक काम करने के बावजूद कुछ लोग विरोधियों के बहकावे में आ गए और उसी मेहनत पर पानी फेर दिया, जिसे वर्षों तक जमीन पर किया गया था। ऐसे में अभय सिंह यादव का यह बयान न केवल एक भावनात्मक उदाहरण माना जा रहा है, बल्कि इसे अपने काम और राजनीतिक अनुभव का अप्रत्यक्ष संदेश भी समझा जा रहा है, जो समर्थकों और विरोधियों—दोनों को एक साथ संकेत देता नजर आ रहा है।
कुल मिलाकर, दक्षिण हरियाणा की राजनीति में अब तंज और प्रतीकों के जरिए संदेश देने का दौर तेज होता नजर आ रहा है, जहां हर बयान अपने साथ एक बड़ा सियासी संकेत लेकर आ रहा है और आने वाले समय में यह बहस चुनावी माहौल को भी प्रभावित कर सकती है।
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