अहीरवाल की सत्ता पर निर्णायक जंग : विरासत की हुकूमत या विकास की ज़िद ,छह अप्रैल नांगल चौधरी में फिर चाय
अहीरवाल के महेंद्रगढ़ ज़िले की राजनीति पिछले कुछ वर्षों से बार-बार नए और तीखे रूपों में सामने आ रही है। गत विधानसभा चुनावों में विशेषकर नांगल चौधरी हल्के में प्रारंभ हुई लड़ाई अब भी थमने का नाम नहीं ले रही। चुनाव के बाद कुछ समय तक स्थिति सामान्य अवश्य दिखाई दी, पर उसके बाद सत्ता और वर्चस्व का ऐसा संघर्ष शुरू हुआ, जो रुकने के बजाय लगातार फैलता और गहराता गया। चुनाव में डॉक्टर अभय सिंह की हार के उपरांत भी विरोधियों का शांत न होना इस पूरे विवाद को नई दिशा और नया स्वरूप देता दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि अब यह संघर्ष केवल एक चुनावी पराजय या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे क्षेत्रीय राजनीति के भीतर चल रही गहरी खींचतान के रूप में देखा जाने लगा है।
नांगल चौधरी से उठी लपट : हार के बाद भी अभय को पूरी तरह हाशिये पर धकेलने की कोशिश
केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी के जीतने और मंत्रिमंडल में स्थान पाने के बाद सामान्य राजनीतिक समझ यह कहती थी कि नांगल चौधरी का चुनावी अध्याय यहीं कुछ समय के लिए शांत हो जाएगा। परंतु घटनाक्रम इसके विपरीत दिशा में बढ़ा। डॉक्टर अभय सिंह की हार से संतुष्ट होने के बजाय, उन्हें राजनीति के परदे से पूर्ण रूप से हटाने का एक सुनियोजित प्रयास शुरू हुआ। यही वह बिंदु है, जहाँ से यह संघर्ष साधारण प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बनता हुआ दिखाई देता है। नांगल चौधरी हल्के में सीधा दखल बढ़ाया गया, कार्यकर्ताओं के नाम पर डॉक्टर अभय सिंह के कट्टर विरोधियों के यहाँ जलपान की प्रक्रिया आरंभ हुई और इस पूरी कवायद ने साफ संकेत दिया कि लक्ष्य केवल चुनावी विजय नहीं, बल्कि प्रभाव क्षेत्र पर स्थायी कब्जा स्थापित करना है।
संगठन में सेंध की राजनीति : सहानुभूति से शुरू होकर नज़दीकियों तक पहुँची चाल
यह भी कहा जा रहा है कि संगठन के कुछ ज़िला स्तर के पदाधिकारियों की सहानुभूति राव साहब चुनाव के दौरान ही हासिल करने में सफल हो गए थे । बाद की राजनीति में इन्हीं संपर्कों का उपयोग करते हुए डॉक्टर अभय सिंह के नज़दीकी लोगों को अपनी ओर करने का प्रयास शुरू हुआ। इस पूरी प्रक्रिया को देखने वाले राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह केवल सामान्य मेल-मिलाप नहीं था, बल्कि प्रभाव क्षेत्र को धीरे-धीरे भीतर से कमजोर करने की रणनीति थी। राजनीति में प्रत्यक्ष टकराव जितना प्रभावी नहीं होता, उससे कहीं अधिक असर अंदरूनी टूटन और विश्वास के संकट का होता है। नांगल चौधरी के घटनाक्रम में यह पहलू लगातार उभरकर सामने आता रहा।

भुंगारका की चाय से पलटा समीकरण : अभय ने वहीं से दिया जवाब, जहाँ से चुनौती उठी थी
कुछ समय तक खामोश रहने के बाद अंततः डॉक्टर अभय सिंह ने भी राव वर्चस्व को खुली चुनौती दी। महत्वपूर्ण यह रहा कि उन्होंने जवाब भी उसी सामाजिक-राजनीतिक शैली में दिया, जिसमें उनके खिलाफ मोर्चाबंदी का आरंभ हुआ था। भुंगारका गाँव से आयोजित डॉक्टर अभय सिंह की वह चाय कई दिनों तक मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी रही। इस चाय ने केवल एक कार्यक्रम का रूप नहीं लिया, बल्कि उसने यह संदेश दिया कि डॉक्टर अभय सिंह अभी न तो मैदान छोड़ने के मूड में हैं और न ही अपनी राजनीतिक ज़मीन किसी के लिए खाली करने को तैयार हैं। भुंगारका की यह चाय वस्तुतः एक प्रतीक बन गई—एक ऐसे जवाबी प्रहार का प्रतीक, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि नांगल चौधरी की लड़ाई अब लंबी चलेगी।

संघर्ष का दूसरा दौर : महेंद्रगढ़ से चली नई चाल और बदलते समीकरण
अब इस संघर्ष का दूसरा दौर हाल ही में उस समय प्रारंभ हुआ, जब राव इंद्रजीत सिंह की बेटी आरती राव ने महेंद्रगढ़ के वर्तमान विधायक कंवर सिंह यादव के घर से भोजन-राजनीति का संकेत दिया। कंवर सिंह यादव को डॉक्टर अभय सिंह के अत्यंत निकट माना जाता रहा है। ऐसे में उनका इस प्रकार अचानक रुख बदलना डॉक्टर अभय सिंह के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। वह भी उस समय, जब डॉक्टर अभय सिंह एक महीने से अधिक समय से असम के चुनावी कार्यों में व्यस्त बताए जा रहे हैं। राजनीति में समय का अपना अलग महत्व होता है, और यह घटनाक्रम ऐसे समय घटित हुआ जब डॉक्टर अभय सिंह अपने गृहक्षेत्र से कुछ दूरी पर थे। इस कारण इस प्रकरण की राजनीतिक व्याख्या और अधिक गहरी हो गई है।
छह अप्रैल का संदेश : नांगल चौधरी में फिर चाय, और टकराव की नई भूमिका
इतना ही नहीं, इसके तुरंत बाद आरती राव द्वारा छह अप्रैल को नांगल चौधरी हल्के में कुछ समर्थकों के यहाँ चाय कार्यक्रम तय कर दिए गए। इस कदम ने स्पष्ट कर दिया कि यह कोई एक-दो प्रतीकात्मक मुलाकातों तक सीमित राजनीतिक गतिविधि नहीं है, बल्कि एक व्यापक संदेश देने की कोशिश है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि डॉक्टर अभय सिंह असम से लौटने के बाद इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। हालांकि यह लगभग निश्चित प्रतीत होता है कि देर-सवेर इस पर राजनीतिक प्रतिक्रिया अवश्य होगी। क्योंकि अब यह संघर्ष उस अवस्था में पहुँच चुका है, जहाँ चुप्पी को भी राजनीतिक अर्थों में पढ़ा जाने लगता है।
बराबरी की लड़ाई नहीं : एक तरफ़ सत्तर साल की विरासत, दूसरी तरफ़ जमीन से उठी चुनौती
यदि इस पूरे संघर्ष में दोनों पक्षों की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखा जाए तो यह किसी भी दृष्टि से समान धरातल की लड़ाई नहीं कही जा सकती। एक ओर राव इंद्रजीत सिंह हैं, जिनके पास लगभग सत्तर वर्ष की राजनीतिक विरासत, लगभग पचास वर्ष का राजनीतिक अनुभव, बड़े घराने की पहचान और उसी के अनुरूप संसाधनों की व्यापक उपलब्धता है। दूसरी ओर डॉक्टर अभय सिंह हैं, जो एक सामान्य परिवार की पृष्ठभूमि से निकलकर इस मुकाम तक पहुँचे हैं। राव परिवार की तुलना में वे किसी भी पारंपरिक राजनीतिक मापदंड पर बराबरी की स्थिति में नहीं है। परंतु यही असमानता इस संघर्ष को और अधिक रोचक तथा गंभीर बनाती है राजनीतिक इतिहास गवाह है कि कई बार संसाधनों से अधिक असर जमीन पर बने विश्वास का होता है।
विकास को बनाया राजनीतिक आधार : अभय की दस वर्षों की पूँजी बनी उनकी ताक़त
डॉक्टर अभय सिंह पिछले दस वर्षों की अपनी विकासपरक राजनीति को ही अपनी असली ताक़त मानते हैं और उसी के आधार पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिखाई देते। यह भी तथ्य है कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे काम किए, जिन्होंने उन्हें सीधे आम आदमी तक पहुँचाया। विशेषकर भूजल सुधार की दिशा में हुआ काम क्षेत्रीय राजनीति में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। जिस इलाके ने वर्षों तक पानी की कमी, सूखेपन और खेती की सीमित संभावनाओं का दबाव झेला हो, वहाँ भूजल स्तर में सुधार केवल सरकारी आँकड़ा नहीं होता, वह किसान के जीवन, उसकी आय, उसकी उम्मीद और उसके भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन जाता है। यही कारण है कि जब अनाज मंडियों के बाहर सरसों और बाजरे से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की पंक्तियाँ दिखाई देती हैं, तो किसानों की चर्चा में डॉक्टर अभय सिंह का नाम स्वतः आ जाना एक सामान्य राजनीतिक संयोग नहीं माना जाता।
परियोजनाओं की राजनीति : मेडिकल कॉलेज, लाजिस्टिक केंद्र, अंडरपास और बाईपास की पृष्ठभूमि
डॉक्टर अभय सिंह के समर्थक यह भी रेखांकित करते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान केवल भाषणात्मक राजनीति नहीं की, बल्कि कई ठोस परियोजनाओं को धरातल पर लाने का प्रयास किया। लगभग सात सौ करोड़ रुपये की लागत से कोरियावास गाँव के पास बना मेडिकल कॉलेज इसका एक बड़ा उदाहरण बताया जाता है। इसके अतिरिक्त लाजिस्टिक केंद्र जैसी महत्त्वाकांक्षी योजना, दताल और गहली जैसे गाँवों के बचे हुए अंडरपास, नारनौल के अधूरे बाईपास के निर्माण की स्वीकृति, और ढोसी के पहाड़ पर रोपवे की परिकल्पना—ये सभी वे उदाहरण हैं, जिनका उल्लेख उनके समर्थक लगातार करते हैं। चुनाव हारने के बाद भी यदि कोई नेता व्यक्तिगत संपर्क और प्रयास से अधूरे कामों की स्वीकृति दिलाने में लगा रहता है, तो यह इस बात का संकेत माना जाता है कि उसके लिए राजनीति केवल सत्ता तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास से जुड़ी हुई है।
विकास बनाम विरासत : महेंद्रगढ़ की लड़ाई अब विचारधारा की टक्कर में बदलती हुई
धीरे-धीरे राव परिवार और डॉक्टर अभय सिंह के बीच यह टकराव विकास और विरासत की दो अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के बीच खड़ी लड़ाई के रूप में सामने आने लगा है। आरती राव के महेंद्रगढ़ दौरे के दौरान उनका यह कहना कि उनके पिताजी ने उन्हें महेंद्रगढ़ ज़िले को दोबारा संभालने के लिए कहा है, इस संघर्ष के मूल भाव को समझने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है। इस कथन को महज़ एक सामान्य राजनीतिक वक्तव्य नहीं माना गया, बल्कि इसे उस दीर्घकालिक रणनीति के रूप में पढ़ा गया, जिसके केंद्र में महेंद्रगढ़ और समूचे अहीरवाल पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने की इच्छा दिखाई देती है। यही वह बिंदु है, जहाँ यह संघर्ष व्यक्तियों की प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर दो राजनीतिक धारणाओं की प्रत्यक्ष भिड़ंत बन जाता है।
विरासत के हस्तांतरण की कोशिश : अहीरवाल में उत्तराधिकार का बड़ा अभियान
राव इंद्रजीत सिंह अपनी बेटी को अपनी पूरी राजनीतिक विरासत हस्तांतरित करते हुए उन्हें पूरे अहीरवाल की नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं—यह बात अब राजनीतिक हलकों में खुलकर कही-सुनी जाने लगी है। उद्देश्य यह बताया जा रहा है कि अहीरवाल के सभी नेता और समूची जनता उनकी बेटी को अहीर राजनीति की स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार करे और उनके मार्ग में कोई भी दूसरी धुरी खड़ी न हो। यह केवल एक पारिवारिक उत्तराधिकार का मामला नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय नेतृत्व की परंपरा पर नियंत्रण बनाए रखने की बड़ी राजनीतिक योजना के रूप में भी देखा जा रहा है। दक्षिण हरियाणा की राजनीति में इसका असर इसलिए भी गहरा है, क्योंकि यहाँ सामाजिक पहचान, परंपरागत प्रभाव और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता अब भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करती है।
राव परिवार की शैली पर चर्चा : विरोधियों को किनारे लगाने का पुराना इतिहास
राव परिवार के बारे में यह धारणा भी लंबे समय से बनी रही है कि यदि उनकी विरासत के रास्ते में, विशेषकर अहीर राजनीति के भीतर, कोई दूसरा नेता गंभीरता से खड़ा होने की कोशिश करता है तो उसे कठोर राजनीतिक तरीके से हाशिये पर धकेल दिया जाता है। उनके आलोचक कहते हैं कि राव इंद्रजीत सिंह इस प्रकार के अनेक राजनीतिक समीकरणों में सफलता प्राप्त करते रहे हैं। अहीरवाल के कई नेताओं को उन्होंने प्रभावहीन करने में कामयाबी पाई और डॉक्टर अभय सिंह को भी ऐसे समय पीछे धकेला गया, जब वे कुछ बड़ा करने की स्थिति तक पहुँचते दिखाई दे रहे थे। यहीं से यह धारणा और मजबूत हुई कि महेंद्रगढ़ की वर्तमान लड़ाई सामान्य प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि नेतृत्व के भविष्य को तय करने वाली लड़ाई है।
भारतीय जनता पार्टी में राव की स्थिति : जितना मिला, उतना शायद पहले कभी नहीं मिला
जहाँ तक भारतीय जनता पार्टी का प्रश्न है, यह कहा जा रहा है कि राव इंद्रजीत सिंह को वह महत्व मिला, जो कांग्रेस ने कभी उन्हें या उनके स्वर्गीय पिता राव वीरेंद्र सिंह को भी नहीं दिया था। राव वीरेंद्र सिंह निस्संदेह बहुत बड़े नेता थे, लेकिन यह भी कहा जाता है कि कांग्रेस ने उन्हें उतनी राजनीतिक छूट और उतने अवसर नहीं दिए, जितने भारतीय जनता पार्टी ने राव इंद्रजीत सिंह को उपलब्ध कराए। इसके बावजूद यह आरोप भी लगातार सुनाई देते रहे हैं कि राव प्रत्येक चुनाव में पार्टी के एक से अधिक उम्मीदवारों के विरुद्ध खेल करवाते हैं। फिर भी पार्टी ने उनसे कभी कठोर जवाब-तलब नहीं की। इस स्थिति ने राव की ताक़त को और बढ़ाया। एक ओर टिकट की आकांक्षा रखने वालों की बड़ी संख्या हर हल्के में उन्हें कार्यकर्ताओं के रूप में उपलब्ध हो जाती है, जो भीड़ और चंदा दोनों जुटाती है; दूसरी ओर टिकट कटने के भय से क्षेत्रीय नेता खुलकर उनके विरुद्ध बोलने का साहस नहीं कर पाते। इस प्रकार उनका राजनीतिक वर्चस्व डर, दबाव और संगठनात्मक प्रभुत्व के सम्मिलित रूप में आगे बढ़ता दिखाई देता है।

परियोजनाओं में अड़ंगे का आरोप : अभय से जुड़ी योजनाएँ विवादों में क्यों घिरीं
डॉक्टर अभय सिंह के प्रभाव को समाप्त करने के लिए उनके द्वारा प्रारंभ की गई परियोजनाओं में अड़ंगा डालने से भी परहेज नहीं किया गया—ऐसा आरोप उनके समर्थक निरंतर लगाते रहे हैं। नारनौल के पास कोरियावास गाँव में लगभग सात सौ करोड़ रुपये से बने मेडिकल कॉलेज को जानबूझकर विवादों में फँसाया गया। पहले नामकरण को मुद्दा बनाकर कई महीने धरना चलवाया गया और उसके बाद इस संस्थान को डॉक्टरों, कर्मचारियों और अन्य आवश्यक संसाधनों से वंचित रखा गया। आरोप यह भी है कि स्वास्थ्य तंत्र की उपेक्षा ने इस महत्त्वपूर्ण संस्थान को बर्बादी के रास्ते पर धकेला। इसी तरह लाजिस्टिक केंद्र की ज़मीन खरीद के आठ वर्ष बाद स्वयं राव इंद्रजीत सिंह द्वारा सार्वजनिक रूप से ज़मीन खरीद में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए और उसके बाद विरोध-प्रदर्शन की पृष्ठभूमि में उस परियोजना को भी पीछे धकेलने का प्रयास हुआ। डॉक्टर अभय सिंह के समर्थकों का निष्कर्ष साफ है—राव पक्ष किसी भी ऐसी परियोजना को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता, जिससे अभय का नाम और प्रभाव जुड़ा हो।
हार के बाद भी नहीं टूटा मनोबल : अभय अब भी विकास के पक्ष में मुखर
इन सबके बावजूद, और चुनावी हार के बाद भी, पूर्व सिंचाई मंत्री डॉक्टर अभय सिंह यादव पूरी बेबाकी से विकास-विरोधी सोच के खिलाफ न केवल बोल रहे हैं, बल्कि अपनी विकासपरक राजनीति को मजबूती से लोगों के सामने रख रहे हैं। इसका मूल कारण, और उनकी सबसे बड़ी शक्ति, किसानों के बीच उनकी लोकप्रियता को माना जा रहा है। प्रत्येक वर्ष भूजल स्तर में निरंतर सुधार ने किसानों की खुशहाली को बढ़ाया है और नांगल चौधरी ही नहीं, बल्कि पूरे महेंद्रगढ़ ज़िले में किसान समुदाय के बीच उनके प्रति एक प्रकार का भावनात्मक लगाव पैदा किया है। यही कारण है कि जिले में उनके कार्यक्रमों में उमड़ने वाली भीड़ की तुलना राव इंद्रजीत सिंह और आरती राव के कार्यक्रमों से की जाने लगी है। उनके समर्थकों का दावा है कि अभय के कार्यक्रमों में लोगों की स्वाभाविक उपस्थिति अधिक दिखाई देती है।
अब खोने को कुछ नहीं : समर्थकों की नज़र में यह व्यक्ति नहीं, विचार की लड़ाई
डॉक्टर अभय सिंह के समर्थक खुले शब्दों में कहते हैं कि अब उन्हें खोने का डर नहीं है। उनका कहना है कि अभय सिंह का इस क्षेत्र से ऐसा लगाव है कि वे किसी भी कीमत पर पिछले दस वर्षों में स्थापित विकास की राजनीति को विरासत के पुराने ढर्रे के हवाले नहीं होने देना चाहते। वे इस विश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि इक्कीसवीं सदी की राजनीति में विरासत जैसे शब्द धीरे-धीरे अप्रासंगिक और अस्वीकार्य होते जा रहे हैं। उनके समर्थकों का स्पष्ट कथन है कि डॉक्टर अभय सिंह की राव इंद्रजीत सिंह से कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है; यह एक राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई है। एक ओर वह राजनीति है, जो वंशगत अधिकार और परंपरागत प्रभुत्व के सहारे नेतृत्व स्थापित करना चाहती है; दूसरी ओर वह राजनीति है, जो काम, संपर्क, जनविश्वास और विकास को आधार बनाकर अपनी जगह बनाना चाहती है।
आने वाला समय क्या तय करेगा : आरती राव विरासत संभालेंगी या अभय विकास की राह बचाएंगे
अब यह भविष्य के गर्भ में है कि महेंद्रगढ़ ज़िले में आरती राव अपनी पुरानी विरासत को पुनः स्थापित कर पाएँगी या डॉक्टर अभय सिंह अपनी विकास की ज़िद में सफल होंगे। परंतु इतना निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि यह टकराव किसी तात्कालिक राजनीतिक शोर का परिणाम नहीं है। यह एक लंबी, गहरी और दूरगामी लड़ाई है, जिसका असर केवल नांगल चौधरी या महेंद्रगढ़ तक सीमित नहीं रहेगा। इसके कंपन पूरे दक्षिण हरियाणा की राजनीति में महसूस किए जाएँगे। क्योंकि जब किसी क्षेत्र में नेतृत्व का प्रश्न विरासत बनाम विकास के रूप में खड़ा हो जाए, तब वह चुनावी चर्चा नहीं रह जाता, वह आने वाले वर्षों की राजनीतिक धुरी बन जाता है। यही कारण है कि महेंद्रगढ़ की यह लड़ाई अब केवल दो पक्षों की नहीं, बल्कि पूरे अहीरवाल की राजनीतिक दिशा तय करने वाली लड़ाई के रूप में देखी जा रही है।
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